Opinion : गाय – माता या राजनीतिक पशु

By Kavita

भीष्म साहनी का ‘तमस’ पढ़ रही थी, विभाजन के समय से ही या उससे पहले से भी, दंगा कराने के लिए इस देश में, दंगों और ढंगों के इस देश में, जहाँ ढंग के अब सिर्फ दंगे ही बचे है, कोई ख़ास मेहनत नहीं करनी पड़ती । बिल्कुल आसान काम है, या तो मरी हुई गाय मिल जाए या मरा हुआ सूअर, दंगें अपने आप ही हो जाते है । पॉलीथिन खाने के सिवाय इन जिन्दां पशुओं का कोई ख़ास काम बचा नहीं है, पर अगर मर जाए तो लाशों के ढेर लगने में ज्यादा समय नहीं लगता । गाय और सूअर की मौत एक ख़ास किस्म का धार्मिक संक्रमण पैदा करती है, जो HIV और स्वाइन फ्लू के वायरस से भी ज्यादा जानलेवा है ।

आखिर ऐसा क्या है की इस वक़्त में, अब जब हिन्दू होने का मतलब दीवाली की पूजा में लक्ष्मीजी के सामने गहने और पैसे रखना रह गया है, वहां सड़क पर आवारा घूमने वाली गाय भयानक मौत के ताण्डवों का कारण बन जाती है । गाय से इंसानी भावनायें आहत हो जाती है, पर इंसान के भूखा मरने से नहीं होती । यह किस तरह का बौद्धिक खोखलापन है जो खुद के विकासशील होने का दावा करता है और अब तक मनुस्मृति के चंगुल से बाहर आने में असमर्थ है । और शहरों के वो लोग, जिन्हें सालों तक गाय दिखती नहीं और दिखती है तो भी वो दो फुट की दूरी से निकल जाते है, उन्हें गाय को लेकर अपनी भावनाएं आहत करने का क्या हक़ है ?

गाय तो हमेशा से ही रही है, और मरती भी आई है, पहले जब जंगल में रहती थी तो शेर और बाघ खाते थे, तो क्या वे हिन्दू धर्म के दुश्मन थे । क्या पता रहे हों, इसलिए ही मोगली वाली जंगल बुक में शेर का नाम शेरखान था । पर गाय और सूअर के साथ धर्म का क्या लेना देना हो सकता है ? ये प्राणी तो धर्मों की स्थापना से पहले से मौजूद थे, और वहां पर भी है, जहाँ पर अभी तक इन धर्मों की स्थापना नहीं हुई है । ऐसा तो है नहीं की गाय सिर्फ हिंदुस्तान में रहती है, या जहाँ इस्लाम है वहां सूअर पैदा होना बंद हो गए । ये दोनों प्राणी न इंसानों के द्वारा पैदा किए गए और न ही उनके गुलाम थे ।

ऐसी बात नहीं है की में गायों को मारने की पक्षधर हूँ, या फिर उनसे सहानुभूति नहीं रखती । पर उनके नाम पर जिस तरह की बातें की जा रहीं है, उनमें गायों के लिए कुछ भी नहीं रखा है । जब आप गायों को सिर्फ उनके दूध के लिए पाले हुए है और बछड़े-बछड़ियों के मुहँ में उनके दूध का एक घूँट भी नहीं जाने देते तो उनके लिए कुछ हो भी नहीं सकता । गाय को जिन्दा रहने के लिए घास चाहिए होती है, जो उसे जंगलों में मिल ही जाया करती थी तो फिर इंसान ऐसा क्या कर रहे है उसके लिए, ऊपर से खून-खराबा करते है, दंगें फैलाते है, अब बेचारी गाय करे तो क्या करे ।

असल में बात यह है की हम विकास के जिस भयावह रास्ते पर निकले है, उसमें गायों के लिए सिर्फ मरना ही लिखा है । गाय पालने वाले इंसान ही भूख और कर्ज से आत्महत्या कर रहे है, गाय कहाँ से जिन्दा बचेगी । गाय के जोड़ीदार बैल की जगह अब खेतों में ट्रैक्टर ने ले ली है । ट्रैक्टर खरीदने के लिए आपको सरकारी अनुदान भी मिलता है और बैंक भी लोन देती है, पर गाय या बैल खरीदने के लिए नहीं । पी साईनाथ की किताब ‘Everybody loves a good drought’ पढ़ेंगे तो पाएँगे की कैसे हमारे सरकारी अफसरों ने गाय और बैलों की बेहतरीन नस्लों को विलुप्ति की कगार पर पहुंचा दिया है ।

गाय बचाने वाले आखिर में गायों के साथ करना क्या चाहते है, न उन्होंने गायों को रहने के लिए जमीन छोड़ी है, न चरने के लिए । बचे-कुचे जंगल भी अब उद्योगपतियों को बेचने की तैयारी चल रही है । तो गाय आखिर जाएगी कहाँ ?? सड़क पर घुमते हुए पॉलीथिन खाएगी जो जाकर उनकी आँतों में फंस जाएगी । बीच-बीच में उनके नाम पर दंगे होते रहेंगे । फिर किसी महानगर में एशियाई या कामनवेल्थ खेल होंगे और इन गायों को पकड़कर किसी नए शहर में छोड़ दिया जाएगा, और फिर वही दंगे । जैसा की रमाशंकर यादव विद्रोही कहते है,

एक बाणी गाय का एक लोंदा गोबर
गाँव को हल्दीघाटी बना देता है
जिस पर टूट जाती है जाने कितनी टोकरियाँ
कच्ची रह जाती है जाने कितनी रोटियां
जाने कब से चला आ रहा है यह महाभारत

5 thoughts on “Opinion : गाय – माता या राजनीतिक पशु”

  1. बहोत सही लिखा है आपने,हमारे दिल की बात लिखी है।कभी कभी यही लगता है की क्या हो रहा है इस देश में? कहा जा रहा है यह देश? बाकि देश देखो जहा इन सारी बकवास चीजो की कोई कीमत नही इसलिए आज वो इतने आगे है।इस देश को अगर बचाना है तो एक बार फिर मनुस्मृति को जलाना होगा।तभी यह देश बचपयेगा

  2. हम में से कुछ असमर्थ है गाय को पालने में तो वो क्या काट देंगे ?
    गाय पोलिथीन व चारा खा सकती हैं तो गाय खाने वालों को भी चारा खा लेना चाहिए ।

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