Opinion : हमारे साहित्यकार, उनके साहित्यकार और आपके ?????

By Garvit Garg

पिछले दिनो हमारे साहित्यकार एक गहरी नींद से जागे है, कुछ जागे है, बहुत से अब तक सो रहे है । पर काफी दिनों बाद साहित्यकारों को लेकर जनता के बीच में चर्चा हो रही है । बहुत से लोगों को अब पता चला है कि चेतन भगत और दुर्जोय दत्ता के अलावा भी लेखक है और अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाओं में भी किताबें लिखी जाती है ।

इन साहित्यकारों को लेकर बहुत से सत्य है, पहला सत्य तो यह कि ये लोग अब तक बचे हुए है । एक सत्य यह भी कि ये लोग सो रहे थे और इनमे से कुछ अच्छा लिखते भी है । बहुत से कुछ जनांदोलनों से भी जुड़े हुए थे और कुछ ने दुनिया को नकारा मानकर अपनी एक अलग बुद्धिजीवी दुनिया बना ली थी । यह भी सत्य है कि इनको ज्यादा लोग जानते नहीं और अवार्ड लौटा कर इनको दो मिनट का फेम मिल रहा है । ये सभी बातें सत्य है और हम मे से हर किसी ने अपनी सुविधा के अनुसार इनमे से एक या दो सत्य चुन लिए है ।

पुरस्कार लौटाना साहित्यकारों की पुरानी आदत है । साहित्यकार भावुक लोग होते है भावुकता में बहकर पुरस्कार लौटाते रहते हैं,  पर यह संख्या एक या दो से ऊपर नहीं जा पाती । भारतीय इतिहास में तो यह पहली बार है कि इतने साहित्यकारों ने इनाम लौटाया है । क्रिकेट में तो भारत की तरफ से कोई शतक मार नहीं रहा है, शायद साहित्यकार ही मार दें ।

साहित्यकारों के इस विरोध को कैसे देखा जाए इस बारे मे ज्यादा सोचने की जरुरत नहीं है । हमारे यहां विचार पहले से बने बनाए होते है । जो सत्ता में होता है उसको सब कुछ अपने खिलाफ ही दिखाई देता है । बाकी पार्टी अभी चुप ही रहने वाली है क्योंकि लिखने वाले साहित्यकार उनके लिए भी मुसीबत ही है । उद्योग घरानों को भी उनसे दिक्कत है ,क्योंकि साहित्यकार बहुत भावुक होते है और उनकी तरह के विकास को समर्थन नहीं देते है , इसलिए उन्होंने अपने लिए नए तरीके के अर्थशास्त्री साहित्यकार चुन लिए है । अब सिर्फ आपका चुनाव बाकी है । पर आपको भी चुनाव करने से पहले बहुत से सवाल पूछने पड़ेंगे और खुद से पूछने पड़ेंगे, क्योंकि हर चीज का दोष सरकार पर या इन साहित्यकारों पर मँढ़ने से काम नहीं चलेगा ।

क्योंकि इस बीच में, जब साहित्यकार तथाकथित रूप से सो रहे थे, आप चेतन भगत को बेस्टसेलर बना रहे थे और सलमान खान को 500 करोड़ के क्लब में पहुंचा रहे थे ।साहित्यकारों से सवाल पूछने से पहले खुद से पूछिये की आपने चेतन भगत और फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे टाइप्स के अलावा कितनी किताबें पढ़ी और इनमे से कितनी भारतीय भाषाओँ में थी । यह भी बताइए की जब आपने अच्छे दिन लाने के लिए मोदीजी को वोट किया तो उनके दंगे वाले दिनों का साहित्य क्यों नहीं पढ़ा ?
यह सब सवाल जरूरी इसलिए है की हमारे यहाँ हर किसी को, जिसमे आप और में शामिल हैं, अपनी जिम्मेदारियों को दूसरों पर थोपके भागने की आदत पड़ गई है । सरकार का कहना है की जनता ने हमें हिन्दू राष्ट्र के लिए ही चुना था, मीडिया का कहना है की हम वही दिखाते है जो जनता देखना चाहती है, साहित्यकारों का कहना है की कोई किताबें खरीदकर पढता ही नहीं, उद्योगपतियों का कहना है की हम भ्रस्टाचार भी करते है तो विकास के लिए करते हैं, जनता का कहना है की हम कुछ करें तो भी क्या हो जाएगा । सबने अपने बचाव के तरीके निकाल लिए हैं ।

पर जिम्मेदारी तो साहित्यकारों की भी है, अब जागें है तो दोबारा न सोने की । इन्हें जनता के बीच वापस जाना होगा । जिस सेक्युलर विरासत की बात करते है उसे धुप और बरसात में खड़े होकर जनता को समझाना होगा । अपने आपसी मतभेदों को भुलाकर एकत्रित होना होगा ।

इस समय, सरकार ने तय कर लिया है की वो साहित्यकारों के विरोध को कैसे देखना चाहती है, अलग-अलग मीडिया घरानों ने भी तय कर लिया है की वो इसे कैसे दिखाना चाहते है, सम्बित पात्रा ने भी तय कर लिया है की जब तक उनकी दूकान चल रही है, उन्हें बेवकूफ दिखने में कोई हर्ज नहीं । अब तय आपको करना है की आप किस तरफ है, आदमी के पक्ष में हो या आदमखोर हो ??

One thought on “Opinion : हमारे साहित्यकार, उनके साहित्यकार और आपके ?????”

  1. Bhut sundar.mai bhi thodi uljhi si hun.kabhi lagta hai purskar lsutana iska hal nhi ,fir lagta hai kab tak chup rhenge khi na khi se soye budhijivi jage ,to sayd kuchh achha ho.jhan tak baat chetan bhagat ki books ka hai to garvit unki nhi kitabe padhne wale sirf dikhawe ke liye 2/4 books padh li hai.unhe baki sahity se koi Matlab nhi.isse sirf ek fayda hai ki dosto ke bich dinge hankne ka mouka ya thode budhijivi hone ka dikhwa kh lo pura ho jata hai .aise Hi likhte rahiye .

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