Opinion : गाय – माता या राजनीतिक पशु

By Kavita

भीष्म साहनी का ‘तमस’ पढ़ रही थी, विभाजन के समय से ही या उससे पहले से भी, दंगा कराने के लिए इस देश में, दंगों और ढंगों के इस देश में, जहाँ ढंग के अब सिर्फ दंगे ही बचे है, कोई ख़ास मेहनत नहीं करनी पड़ती । बिल्कुल आसान काम है, या तो मरी हुई गाय मिल जाए या मरा हुआ सूअर, दंगें अपने आप ही हो जाते है । पॉलीथिन खाने के सिवाय इन जिन्दां पशुओं का कोई ख़ास काम बचा नहीं है, पर अगर मर जाए तो लाशों के ढेर लगने में ज्यादा समय नहीं लगता । गाय और सूअर की मौत एक ख़ास किस्म का धार्मिक संक्रमण पैदा करती है, जो HIV और स्वाइन फ्लू के वायरस से भी ज्यादा जानलेवा है ।

आखिर ऐसा क्या है की इस वक़्त में, अब जब हिन्दू होने का मतलब दीवाली की पूजा में लक्ष्मीजी के सामने गहने और पैसे रखना रह गया है, वहां सड़क पर आवारा घूमने वाली गाय भयानक मौत के ताण्डवों का कारण बन जाती है । गाय से इंसानी भावनायें आहत हो जाती है, पर इंसान के भूखा मरने से नहीं होती । यह किस तरह का बौद्धिक खोखलापन है जो खुद के विकासशील होने का दावा करता है और अब तक मनुस्मृति के चंगुल से बाहर आने में असमर्थ है । और शहरों के वो लोग, जिन्हें सालों तक गाय दिखती नहीं और दिखती है तो भी वो दो फुट की दूरी से निकल जाते है, उन्हें गाय को लेकर अपनी भावनाएं आहत करने का क्या हक़ है ?

गाय तो हमेशा से ही रही है, और मरती भी आई है, पहले जब जंगल में रहती थी तो शेर और बाघ खाते थे, तो क्या वे हिन्दू धर्म के दुश्मन थे । क्या पता रहे हों, इसलिए ही मोगली वाली जंगल बुक में शेर का नाम शेरखान था । पर गाय और सूअर के साथ धर्म का क्या लेना देना हो सकता है ? ये प्राणी तो धर्मों की स्थापना से पहले से मौजूद थे, और वहां पर भी है, जहाँ पर अभी तक इन धर्मों की स्थापना नहीं हुई है । ऐसा तो है नहीं की गाय सिर्फ हिंदुस्तान में रहती है, या जहाँ इस्लाम है वहां सूअर पैदा होना बंद हो गए । ये दोनों प्राणी न इंसानों के द्वारा पैदा किए गए और न ही उनके गुलाम थे ।

ऐसी बात नहीं है की में गायों को मारने की पक्षधर हूँ, या फिर उनसे सहानुभूति नहीं रखती । पर उनके नाम पर जिस तरह की बातें की जा रहीं है, उनमें गायों के लिए कुछ भी नहीं रखा है । जब आप गायों को सिर्फ उनके दूध के लिए पाले हुए है और बछड़े-बछड़ियों के मुहँ में उनके दूध का एक घूँट भी नहीं जाने देते तो उनके लिए कुछ हो भी नहीं सकता । गाय को जिन्दा रहने के लिए घास चाहिए होती है, जो उसे जंगलों में मिल ही जाया करती थी तो फिर इंसान ऐसा क्या कर रहे है उसके लिए, ऊपर से खून-खराबा करते है, दंगें फैलाते है, अब बेचारी गाय करे तो क्या करे ।

असल में बात यह है की हम विकास के जिस भयावह रास्ते पर निकले है, उसमें गायों के लिए सिर्फ मरना ही लिखा है । गाय पालने वाले इंसान ही भूख और कर्ज से आत्महत्या कर रहे है, गाय कहाँ से जिन्दा बचेगी । गाय के जोड़ीदार बैल की जगह अब खेतों में ट्रैक्टर ने ले ली है । ट्रैक्टर खरीदने के लिए आपको सरकारी अनुदान भी मिलता है और बैंक भी लोन देती है, पर गाय या बैल खरीदने के लिए नहीं । पी साईनाथ की किताब ‘Everybody loves a good drought’ पढ़ेंगे तो पाएँगे की कैसे हमारे सरकारी अफसरों ने गाय और बैलों की बेहतरीन नस्लों को विलुप्ति की कगार पर पहुंचा दिया है ।

गाय बचाने वाले आखिर में गायों के साथ करना क्या चाहते है, न उन्होंने गायों को रहने के लिए जमीन छोड़ी है, न चरने के लिए । बचे-कुचे जंगल भी अब उद्योगपतियों को बेचने की तैयारी चल रही है । तो गाय आखिर जाएगी कहाँ ?? सड़क पर घुमते हुए पॉलीथिन खाएगी जो जाकर उनकी आँतों में फंस जाएगी । बीच-बीच में उनके नाम पर दंगे होते रहेंगे । फिर किसी महानगर में एशियाई या कामनवेल्थ खेल होंगे और इन गायों को पकड़कर किसी नए शहर में छोड़ दिया जाएगा, और फिर वही दंगे । जैसा की रमाशंकर यादव विद्रोही कहते है,

एक बाणी गाय का एक लोंदा गोबर
गाँव को हल्दीघाटी बना देता है
जिस पर टूट जाती है जाने कितनी टोकरियाँ
कच्ची रह जाती है जाने कितनी रोटियां
जाने कब से चला आ रहा है यह महाभारत

Opinion : हमारे साहित्यकार, उनके साहित्यकार और आपके ?????

By Garvit Garg

पिछले दिनो हमारे साहित्यकार एक गहरी नींद से जागे है, कुछ जागे है, बहुत से अब तक सो रहे है । पर काफी दिनों बाद साहित्यकारों को लेकर जनता के बीच में चर्चा हो रही है । बहुत से लोगों को अब पता चला है कि चेतन भगत और दुर्जोय दत्ता के अलावा भी लेखक है और अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाओं में भी किताबें लिखी जाती है ।

इन साहित्यकारों को लेकर बहुत से सत्य है, पहला सत्य तो यह कि ये लोग अब तक बचे हुए है । एक सत्य यह भी कि ये लोग सो रहे थे और इनमे से कुछ अच्छा लिखते भी है । बहुत से कुछ जनांदोलनों से भी जुड़े हुए थे और कुछ ने दुनिया को नकारा मानकर अपनी एक अलग बुद्धिजीवी दुनिया बना ली थी । यह भी सत्य है कि इनको ज्यादा लोग जानते नहीं और अवार्ड लौटा कर इनको दो मिनट का फेम मिल रहा है । ये सभी बातें सत्य है और हम मे से हर किसी ने अपनी सुविधा के अनुसार इनमे से एक या दो सत्य चुन लिए है ।

पुरस्कार लौटाना साहित्यकारों की पुरानी आदत है । साहित्यकार भावुक लोग होते है भावुकता में बहकर पुरस्कार लौटाते रहते हैं,  पर यह संख्या एक या दो से ऊपर नहीं जा पाती । भारतीय इतिहास में तो यह पहली बार है कि इतने साहित्यकारों ने इनाम लौटाया है । क्रिकेट में तो भारत की तरफ से कोई शतक मार नहीं रहा है, शायद साहित्यकार ही मार दें ।

साहित्यकारों के इस विरोध को कैसे देखा जाए इस बारे मे ज्यादा सोचने की जरुरत नहीं है । हमारे यहां विचार पहले से बने बनाए होते है । जो सत्ता में होता है उसको सब कुछ अपने खिलाफ ही दिखाई देता है । बाकी पार्टी अभी चुप ही रहने वाली है क्योंकि लिखने वाले साहित्यकार उनके लिए भी मुसीबत ही है । उद्योग घरानों को भी उनसे दिक्कत है ,क्योंकि साहित्यकार बहुत भावुक होते है और उनकी तरह के विकास को समर्थन नहीं देते है , इसलिए उन्होंने अपने लिए नए तरीके के अर्थशास्त्री साहित्यकार चुन लिए है । अब सिर्फ आपका चुनाव बाकी है । पर आपको भी चुनाव करने से पहले बहुत से सवाल पूछने पड़ेंगे और खुद से पूछने पड़ेंगे, क्योंकि हर चीज का दोष सरकार पर या इन साहित्यकारों पर मँढ़ने से काम नहीं चलेगा ।

क्योंकि इस बीच में, जब साहित्यकार तथाकथित रूप से सो रहे थे, आप चेतन भगत को बेस्टसेलर बना रहे थे और सलमान खान को 500 करोड़ के क्लब में पहुंचा रहे थे ।साहित्यकारों से सवाल पूछने से पहले खुद से पूछिये की आपने चेतन भगत और फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे टाइप्स के अलावा कितनी किताबें पढ़ी और इनमे से कितनी भारतीय भाषाओँ में थी । यह भी बताइए की जब आपने अच्छे दिन लाने के लिए मोदीजी को वोट किया तो उनके दंगे वाले दिनों का साहित्य क्यों नहीं पढ़ा ?
यह सब सवाल जरूरी इसलिए है की हमारे यहाँ हर किसी को, जिसमे आप और में शामिल हैं, अपनी जिम्मेदारियों को दूसरों पर थोपके भागने की आदत पड़ गई है । सरकार का कहना है की जनता ने हमें हिन्दू राष्ट्र के लिए ही चुना था, मीडिया का कहना है की हम वही दिखाते है जो जनता देखना चाहती है, साहित्यकारों का कहना है की कोई किताबें खरीदकर पढता ही नहीं, उद्योगपतियों का कहना है की हम भ्रस्टाचार भी करते है तो विकास के लिए करते हैं, जनता का कहना है की हम कुछ करें तो भी क्या हो जाएगा । सबने अपने बचाव के तरीके निकाल लिए हैं ।

पर जिम्मेदारी तो साहित्यकारों की भी है, अब जागें है तो दोबारा न सोने की । इन्हें जनता के बीच वापस जाना होगा । जिस सेक्युलर विरासत की बात करते है उसे धुप और बरसात में खड़े होकर जनता को समझाना होगा । अपने आपसी मतभेदों को भुलाकर एकत्रित होना होगा ।

इस समय, सरकार ने तय कर लिया है की वो साहित्यकारों के विरोध को कैसे देखना चाहती है, अलग-अलग मीडिया घरानों ने भी तय कर लिया है की वो इसे कैसे दिखाना चाहते है, सम्बित पात्रा ने भी तय कर लिया है की जब तक उनकी दूकान चल रही है, उन्हें बेवकूफ दिखने में कोई हर्ज नहीं । अब तय आपको करना है की आप किस तरफ है, आदमी के पक्ष में हो या आदमखोर हो ??

The Recycled Poetry : यतीन्द्र मिश्र – जुलाहों का घर

जुलाहों का घर
कहीं ढूँढा जाता है ??

किधर भी चले जाओ
अगर उस रास्ते पर
काशी
मगहर
अयोध्या
जैसा कोई नगर दिख पड़े
तो घर वहीँ मिल जाता है

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जुलाहों का घर
कब ढूँढा जाता है ?

अगर चलते जाओ
सब दिशाओं की तरफ
और उस रास्ते पर कभी
काशी
मगहर
अयोध्या
जैसा कोई नगर न आये

तब वहीँ से
घर फिर खोजा जाता है

जुलाहों का घर
क्यों ढूँढा जाता है ?

कहीं जाना न हो
न ही कहीं से आना हो
ऐसे में अगर
काशी
मगहर
अयोध्या
जैसे नगरों की सुध आए

तभी घर ढूँढा जाता है ।

Still Relevant : हरिशंकर परसाई – एक गौभक्त से मुलाकात

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एक शाम रेलवे स्टेशन पर एक स्वामीजी के दर्शन हो गए. ऊँचे, गोरे और तगड़े साधु थे. चेहरा लाल. गेरुए रेशमी कपड़े पहने थे. साथ एक छोटे साइज़ का किशोर संन्यासी था. उसके हाथ में ट्रांजिस्टर था और वह गुरु को रफ़ी के गाने के सुनवा रहा था.
मैंने पूछा- स्वामी जी, कहाँ जाना हो रहा है?
स्वामीजी बोले – दिल्ली जा रहे हैं, बच्चा!
स्वामीजी बात से दिलचस्प लगे. मैं उनके पास बैठ गया. वे भी बेंच पर पालथी मारकर बैठ गए. सेवक को गाना बंद करने के लिए कहा.
कहने लगे- बच्चा, धर्मयुद्ध छिड़ गया. गोरक्षा-आंदोलन तीव्र हो गया है. दिल्ली में संसद के सामने सत्याग्रह करेंगे.
मैंने कहा- स्वामीजी, यह आंदोलन किस हेतु चलाया जा रहा है?
स्वामीजी ने कहा- तुम अज्ञानी मालूम होते हो, बच्चा! अरे गौ की रक्षा करना है. गौ हमारी माता है. उसका वध हो रहा है.
मैंने पूछा- वध कौन कर रहा है?
वे बोले- विधर्मी कसाई.
मैंने कहा- उन्हें वध के लिए गौ कौन बेचते हैं? वे आपके सधर्मी गोभक्त ही हैं न?
स्वामीजी ने कहा- सो तो हैं. पर वे क्या करें? एक तो गाय व्यर्थ खाती है, दूसरे बेचने से पैसे मिल जाते हैं.
मैंने कहा- यानी पैसे के लिए माता का जो वध करा दे, वही सच्चा गो-पूजक हुआ!
स्वामीजी मेरी तरफ़ देखने लगे. बोले- तर्क तो अच्छा कर लेते हो, बच्चा! पर यह तर्क की नहीं, भावना की बात है. इस समय जो हज़ारों गोभक्त आंदोलन कर रहे हैं, उनमें शायद ही कोई गौ पालता हो. पर आंदोलन कर रहे हैं. यह भावना की बात है.
स्वामीजी से बातचीत का रास्ता खुल चुका था. उनसे जमकर बातें हुईं, जिसमें तत्व मंथन हुआ. जो तत्व प्रेमी हैं, उनके लाभार्थ वार्तालाप नीचे दे रहा हूँ.
स्वामी और बच्चा की बात-चीत
-स्वामीजी, आप तो गाय का दूध ही पीते होंगे?
-नहीं बच्चा, हम भैंस के दूध का सेवन करते हैं. गाय कम दूध देती है और वह पतला होता है. भैंस के दूध की बढ़िया गाढ़ी मलाई और रबड़ी बनती है.
तो क्या सभी गोभक्त भैंस का दूध पीते हैं?
हाँ, बच्चा, लगभग सभी.
-तब तो भैंस की रक्षा हेतु आंदोलन करना चाहिए. भैंस का दूध पीते हैं, मगर माता गौ को कहते हैं. जिसका दूध पिया जाता है, वही तो माता कहलाएगी.
-यानी भैंस को हम माता….नहीं बच्चा, तर्क ठीक है, पर भावना दूसरी है.
-स्वामीजी, हर चुनाव के पहले गोभक्ति क्यों ज़ोर पकड़ती है? इस मौसम में कोई ख़ास बात है क्या?
-बच्चा, जब चुनाव आता है, तम हमारे नेताओं को गोमाता सपने में दर्शन देती है. कहती है- बेटा चुनाव आ रहा है. अब मेरी रक्षा का आंदोलन करो. देश की जनता अभी मूर्ख है. मेरी रक्षा का आंदोलन करके वोट ले लो. बच्चा, कुछ राजनीतिक दलों को गोमाता वोट दिलाती है, जैसे एक दल को बैल वोट दिलाते हैं. तो ये नेता एकदम आंदोलन छेड़ देते हैं और हम साधुओं को उसमें शामिल कर लेते हैं. हमें भी राजनीति में मज़ा आता है. बच्चा, तुम हमसे ही पूछ रहे हो. तुम तो कुछ बताओ, तुम कहाँ जा रहे हो?
– स्वामीजी मैं ‘मनुष्य-रक्षा आंदोलन’ में जा रहा हूँ.
-यह क्या होता है, बच्चा?
-स्वामीजी, जैसे गाय के बारे में मैं अज्ञानी हूँ, वैसे ही मनुष्य के बारे में आप हैं.
-पर मनुष्य को कौन मार रहा है?
-इस देश के मनुष्य को सूखा मार रहा है, अकाल मार रहा है, महँगाई मार रही है. मनुष्य को मुनाफ़ाखोर मार रहा है,काला-बाज़ारी मार रहा है. भ्रष्ट शासन-तंत्र मार रहा है. सरकार भी पुलिस की गोली से चाहे जहाँ मनुष्य को मार रही है, स्वामीजी, आप भी मनुष्य-रक्षा आंदोलन में शामिल हो जाइए न!
-नहीं बच्चा, हम धर्मात्मा आदमी हैं. हमसे यह नहीं होगा. एक तो मनुष्य हमारी दृष्टि में बहुत तुच्छ है. ये मनुष्य ही तो हैं, जो कहते हैं, मंदिरों और मठों में लगी जायदाद को सरकार जब्त करले, बच्चा तुम मनुष्य को मरने दो. गौ की रक्षा करो. कोई भी जीवधारी मनुष्य से श्रेष्ठ है. तुम देख नहीं रहे हो, गोरक्षा के जुलूस में जब झगड़ा होता है, तब मनुष्य ही मारे जाते हैं.एक बात और है, बच्चा! तुम्हारी बात से प्रतीत होता है कि मनुष्य-रक्षा के लिए मुनाफ़ाख़ोर और काला-बाज़ारी के खिलाफ़ संघर्ष लड़ना पड़ेगा. यह हमसे नहीं होगा. यही लोग तो मंदिरो, मठो व गोरक्षा-आंदोलन के लिए धन देते हैं. हम इनके खिलाफ़ कैसे लड़ सकते हैं
– ख़ैर, छोड़िए मनुष्य को. गोरक्षा के बारे में मेरी ज्ञान-वृद्धि कीजिए. एक बात बताइए, मान लीजिए आपके बरामदे में गेहूँ सूख रहे हैं. तभी एक गोमाता आकर गेहूँ खाने लगती है. आप क्या करेंगे?
– बच्चा? हम उसे डंडा मारकर भगा देंगे.
-पर स्वामीजी, वह गोमाता है पूज्य है. बेटे के गेहूँ खाने आई है. आप हाथ जोड़कर स्वागत क्यों नहीं करते कि आ माता, मैं कृतार्थ हो गया. सब गेहूँ खा जा.
-बच्चा, तुम हमें मूर्ख समझते हो?
-नहीं, मैं आपको गोभक्त समझता था.
– सो तो हम हैं, पर इतने मूर्ख भी नहीं हैं कि गाय को गेहूँ खा जाने दें.
– पर स्वामीजी, यह कैसी पूजा है कि गाय हड्डी का ढाँचा लिए हुए मुहल्ले में काग़ज़ और कपड़े खाती फिरती है और जगह जगह पिटती है!
-बच्चा, यह कोई अचरज की बात नहीं है. हमारे यहाँ जिसकी पूजा की जाती है उसकी दुर्दशा कर डालते हैं. यही सच्ची पूजा है. नारी को भी हमने पूज्य माना और उसकी जैसी दुर्दशा की सो तुम जानते ही हो.
-स्वामीजी, दूसरे देशों में लोग गाय की पूजा नहीं करते, पर उसे अच्छी तरह रखते हैं और वह खूब दूध देती है.
-बच्चा, दूसरे देशों की बात छोड़ो. हम उनसे बहुत ऊँचे हैं. देवता इसीलिए सिर्फ़ हमारे यहाँ अवतार लेते हैं. दूसरे देशों में गाय दूध के उपयोग के लिए होती है, हमारे यहाँ वह दंगा करने, आंदोलन करने के लिए होती है. हमारी गाय और गायों से भिन्न है.
-स्वामीजी, और सब समस्याएँ छोड़कर आप लोग इसी एक काम में क्यों लग गए हैं?
-इसी से सबका भला हो जाएगा, बच्चा! अगर गोरक्षा का क़ानून बन जाए, तो यह देश अपने-आप समृद्ध हो जाएगा. फिर बादल समय पर पानी बरसाएँगे, भूमि ख़ूब अन्न देगी और कारखाने बिना चले भी उत्पादन करेंगे. धर्म का प्रताप तुम नहीं जानते. अभी जो देश की दुर्दशा है, वह गौ के अनादर का परिणाम है.
-स्वामीजी, पश्चिम के देश गौ की पूजा नहीं करते, बल्कि गो-मास खाते हैं, फिर भी समृद्ध हैं?
-उनका भगवान दूसरा है बच्चा. उनका भगवान इस बात का ख़्याल नहीं करता.
– और रूस जैसे देश भी गाय को नहीं पूजते, पर समृद्ध हैं?
-उनका तो भगवान ही नहीं बच्चा. उन्हें दोष नहीं लगता.
यानी भगवान रखना भी एक झंझट ही है. वह हर बात का दंड देने लगता है.
-तर्क ठीक है, बच्चा, पर भावना ग़लत है.
-स्वामीजी, जहाँ तक मैं जानता हूँ, जनता के मन में इस समय गोरक्षा नहीं है, महँगाई और आर्थिक शोषण है. जनता महँगाई के ख़िलाफ़ आंदोलन करती है. जनता आर्थिक न्याय के लिए लड़ रही है. और इधर आप गोरक्षा-आंदोलन लेकर बैठ गए हैं. इसमें तुक क्या है?
-बच्चा, इसमें तुक है. तुम्हे अंदर की बात बताता हूंl देखो, जनता जब आर्थिक न्याय की माँग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज़ में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह ख़तरनाक हो जाती है. जनता कहती है – हमारी माँग है महँगाई कम हो, मुनाफ़ाख़ोरी बंद हो, वेतन बढ़े, शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी माँग गोरक्षा है, आर्थिक क्रांति की तरफ़ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूँटे से बाँध देते हैं. यह आंदोलन जनता को उलझाए रखने के लिए है.
– स्वामीजी, किसकी तरफ़ से आप जनता को इस तरह उलझाए रखते हैं?
– जनता की माँग का जिन लोगो पर असर पड़ेगा, उसकी तरफ़ से. यही धर्म है. एक उदाहरन देते हैं.
बच्चा, ये तो तुम्हे पता ही है कि लूटने वालों के ग्रुप मे सभी धर्मो के सेठ शामिल हैं और लूटे जाने वाले गरीब मज्दूरो मे भी सभी धर्मो के लोग शामिल हैं, मान लो एक दिन सभी धर्मो के हज़ारों भूखे लोग इकटठे होकर हमारे धर्म के किसी सेठ के गोदाम में भरे अन्न को लूटने के लिए निकल पड़ेl सेठ हमारे पास आया. कहने लगा- स्वामीजी, कुछ करिए. ये लोग तो मेरी सारी जमा-पूँजी लूट लेंगे. आप ही बचा सकते हैं. आप जो कहेंगे, सेवा करेंगे. बस बच्चा, हम उठे, हाथ में एक हड्डी ली और मंदिर के चबूतरे पर खड़े हो गए. जब वे हज़ारों भूखे गोदाम लूटने का नारा लगाते आए, तो मैंने उन्हें हड्डी दिखायी और ज़ोर से कहा- किसी ने भगवान के मंदिर को भ्रष्ट कर दिया. वह हड्डी किसी पापी ने मंदिर में डाल दी. विधर्मी हमारे मंदिर को अपवित्र करते हैं., हमारे धर्म को नष्ट करते हैं. हमें शर्म आऩी चाहिए. मैं इसी क्षण से यहाँ उपवास करता हूँ. मेरा उपवास तभी टूटेगा, जब मंदिर की फिर से पुताई होगी और हवन करके उसे पुनः पवित्र किया जाएगा. बस बच्चा, वह जनता जो इकटठी होकर सेठ से लड़ने आ रही थी, वो धर्म के नाम पर आपस में ही लड़ने लगी. मैंने उनका नारा बदल दिया. जव वे लड़ चुके, तब मैंने कहा-धन्य है इस देश की धर्म-प्राण जनता! धन्य है अनाज के व्यापारी सेठ अमुकजी! उन्होंने मंदिर की शुद्धि का सारा ख़र्च देने को कहा है. बच्चा जिस सेठ का गोदाम लूटने भूखे लोग जा रहे थे, वो उसकी ही जय बोलने लगे. बच्चा, यह है धर्म का प्रताप. अगर इस जनता को गोरक्षा-आंदोलन में न लगाएँगे, यह रोजगार प्रापती के लिये आंदोलन करेगी, तनख़्वाह बढ़वाने का आंदोलन करेगी, मुनाफ़ाख़ोरी के ख़िलाफ़ आंदोलन करेगा. जनता को बीच में उलझाए रखना हमारा काम है बच्चा.
-स्वामीजी, आपने मेरी बहुत ज्ञान-वृद्धि की. एक बात और बताइए. कई राज्यों में गोरक्षा के लिए क़ानून है. बाक़ी में लागू हो जाएगा. तब यह आंदोलन भी समाप्त हो जाएगा. आगे आप किस बात पर आंदोलन करेंगे.
-अरे बच्चा, आंदोलन के लिए बहुत विषय हैं. सिंह दुर्गा का वाहन है. उसे सरकसवाले पिंजरे में बंद करके रखते हैं और उससे खेल कराते हैं. यह अधर्म है. सब सरकसवालों के ख़िलाफ़ आंदोलन करके, देश के सारे सरकस बंद करवा देंगे. फिर भगवान का एक अवतार मत्स्यावतार भी है. मछली भगवान का प्रतीक है. हम मछुओं के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ देंगे.सरकार का मछली पालन विभाग बंद करवाएँगे.
बच्चा, लोगो की मुसीबतें तो तब तक खतम नही होंगी, जब तक लूट खत्म नही होगी, एक मुदा और भी बन सकता है बच्चा, हम जनता मे ये बात फैला सकते हैं कि हमारे धर्म के लोगो की सभी मुसीबतों का कारण दूसरे धर्मो के लोग हैं, हम किसी ना किसी तरह जनता को धर्म के नाम पर उलझये रखेगे बच्चा
इतने में गाड़ी आ गई. स्वामीजी उसमें बैठकर चले गए. बच्चा, वहीं रह गया.